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Showing posts from July, 2019

"तुम मेरे खुदा नहीं तो क्या हो"

"तुम मेरे खुदा नहीं तो क्या हो" कैसे कहूं कि तुम मेरे क्या हो, हर रंग हो, खुशी हो, जिंदगी हो, तुम ही कहो,  तुम मेरे खुदा नहीं तो क्या हो। मेरी हर धड़कन में तुम हो, हर सांस में, सीरत में, फितरत में, हर ख़्वाब में,तुम ही तो हो। तुम ही कहो, तुम मेरे खुदा नहीं तो क्या हो। जिंदगी तुमसे, दिल्लगी तुमसे, जिसनगी तुमसे, हर दुआ में तुम ही शामिल। तुम ही कहो, तुम मेरे खुदा नहीं तो क्या हो। नीरज'नील' 12-05-2018

" याद है मुझे "

श्रृंगार रस में एक छोटा सा प्रयास है। आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं। " याद है मुझे " रोज तेरी यादों का तकिया लगा कर सोता हूं मैं, कभी-कभी तेरी यादों के साये में ढलती है रातें मेरी, तेरा स्पर्श सर्दी की नर्म धूप का एहसास कराता है कभी, तेरे चेहरे की चमक देखकर खिल उठता है मन मेरा। तेरी उंगलियों में उंगलियां फंसाकर वो घंटों बैठना याद आता है मुझे। तेरी गर्म सांसों का एहसास अब भी हुआ करता है मुझे। तेरी नर्म उंगलियों का पीठ पर धीरे-धीरे छूआना याद है मुझे। तेरा हर लफ्ज़ एक कहानी सा लगता है मुझे। तेरी मीठी बोली का कानों में अमृत घोलना याद है मुझे। मेरे कांधे पे सर रख कर तेरा समर्पण याद है मुझे। तेरी हर बात, हां हर एक बात याद है मुझे। नीरज'नील' 11-05-2018

"रिश्तों की कहानी, कविता की जूबानी"

"रिश्तों की कहानी, कविता की जुबानी" कुछ रिश्ते कितने बेपरवाह से होते हैं। कुछ रिश्ते कितने लापरवाह से होते हैं। कुछ रिश्ते प्यार से सराबोर हैं। कुछ में एक अजीब सी कशिश हैं। कहीं एक बेखौफ़ सी समझदारी हैं। कहीं रिश्ते घसीटने की लाचारी हैं। कुछ रिश्ते होली की रंग बिरंगी गुलाल हैं। तो कुछ में ना हड्डी न खाल है। कुछ रिश्ते बस अवशेष बनकर रह गए हैं। कुछ मातम के बाद के सन्नाटे से शेष रह गए हैं। कुछ रिश्ते किचड़ में खिले कमल से हैं। तो कुछ कांटों भरे गुलाब से हैं। कहीं चूड़ियों की खनक से हैं रिश्ते। कहीं चाहतों की सनक से हैं रिश्ते। कहीं पूनम की सर्द रात से हैं ये रिश्ते। कहीं जेठ की तपती धूप से ये रिश्ते। कभी नर्म दूब से कोमल ये रिश्ते। कभी नुकिली शूल हो जाएं ये रिश्ते। कभी नर्म तकिये से हो जाएं ये रिश्ते, कभी सख्त, पत्थर से हो जाएं ये रिश्ते। सच है, पर कितनी अजीब है, ये रिश्तों की कहानी, कविता की जुबानी। नीरज'नील' 17-05-2018

"माइके में आई हुई बेटी "

"माइके में आई हुई बेटी " माइके में आई हुई बेटी जब ससुराल जाने को होती है। जब समेटती हैं अपना समान उसको मन भारी सा हो जाता है। बार बार घर के कोनो में अपना सामान तलाशती  वो सामान नहीं बल्कि वहाँ बितायी अपनी यादें समेटती है। तय करती है वो अपने बचपन से लेकर पिता के घर से विदा होने तक का सफ़र । वो छोड़ना नहीं चाहती है उस घर को विदाई के अंतिम क्षण तक फिर एक बार। उसे याद हो आता है विवाह के बाद की विदाई का समय। वो फिर लौट आना चाहती है फिर उसी बचपन में जब माँ की ऊँगली थाम वो घुमा करती थी गलियों में। गली में कुल्फी वाले की आवाज मन को बेचैन कर देती थी। जब माँ से वो कुल्फी के लिए जिद किया करती थी। पिता के कंधे पर बैठकर वो बाजार घूमना भी तो याद हो जाता है पल भर के लिए। आँखों में अब तक का सारा बचपन लड़कपन जवानी सब फिर से घूम जाती है। फिर रोना आता जाता है विदाई का वो दृश्य एक बार फिर वो ही कहानी दोहराता है। मन भारी है, फिर भी वो चल देती है पिया संग। केवल उसकी ख़ुशी के लिए। जाती है संग पिया के, फिर माइके लौट आने की आशा में। पिता के आँगन की सुगंध लिए एक बार फिर विदा होती है। नीरज 'नी...

"मनाली"

आज की कविता "मनाली" कुल्लू से मनाली तक क्या बताऊं यारों सब बहुत भा गया। वहां बिताए हर पल का कितना हिसाब दूं। हर पल में मुझे तो बेहिसाब मज़ा आ गया। खूबसूरत है हर नजारा यहां, वादियां लाजवाब हैं। पहाडों से पिघलती बर्फ, व्यास का कल-कल बहता पानी।। तन में ताज़गी और मन में तरंग जगा गया। क्या बताऊं यारों, "मनाली" में मुझे तो बेहिसाब मज़ा आ गया। देखी मैंने मेहनत और लगन से चलती जिन्दगी यहां। मिठी-मिठी बोली और उतने ही मिटे लोग है यहां। चीड़ के घने-लम्बे वृक्षों के बीच पलती, बर्फ की मोटी चादर के संग खेलती, अपने छोटे-छोटे पांवों में मंथर गति से चलती, बहुत-बहुत, बहुत ही सुन्दर चाल चलती जिन्दगी है यहां। प्रकृति की गोद में पलता ये "मनाली" शहर मुझे बहुत भा गया। क्या बताऊं यारों, "मनाली" में बीते हर पल में मुझे तो बेहिसाब मज़ा आ गया। नीरज'नील' 21-05-2018

"कितने सुंदर लगते हैं"

गीत ("पार्वती" नदी के तट पर बैठे-बैठे जन्मा ये गीत परमपिता परमेश्वर को समर्पित है जिन्होंने मुझे यह सब अनुभव करने का सौभाग्य प्रदान किया।) नीरज'नील' "कितने सुंदर लगते हैं" कल-कल बहती है ये नदियां कितनी सुंदर लगती हैं।। प्यारे- प्यारे हैं ये नजारे कितने सुंदर लगते हैं।। देवदार और चीड़ यहां पर कितने सुंदर लगते हैं।। ऊंचे-ऊंचे हैं पहाड़ ये कितने सुंदर लगते हैं।। ढ़के बर्फ से है पहाड़ ये कितने सुंदर लगते हैं।। मनमोहक है ये हरियाली कितनी सुंदर लगती है।। नदियों के ये घाट- किनारे कितने सुंदर लगते हैं।। जलधारा से हुए ये चिकने पत्थर सुंदर लगते हैं। नीरज'नील' 24-05-2018

"पार्वती"

आज की कविता "पार्वती" पहाड़ों से घाटी में उतरती "पार्वती" कल-कल करती, लहराती, बलखाती, इठलाती पार्वती। निश्चल, निर्मल, अटूट विश्वास, अनमोल आस्था से जुड़ी पार्वती। कुछ देर में ही मुझे अंदर तक भीगो गई। कितने खुश रहते हैं किनारे पर पड़े पत्थर भरे रहते हैं अक्षय ऊर्जा से। पार्वती के प्रिय शिव से, लगे रहते हैं निरंतर तपस्या में। तेज़ तपती धूप में भी, शीतल करती पार्वती। कल-कल करती, लहराती, बलखाती, इठलाती पार्वती। नीरज'नील' 24-05-2018

"पर्वतों के रास्ते"

गीत "पर्वतों के रास्ते" पर्वतों के रास्ते पे चल रहा हूं मैं इस नदी की धार में भी बह रहा हूं मैं। मुझको है मिली घड़ी ये हूं खुशनसीब मैं। इस जहां से उस जहां में ढल गया हूं मैं। पर्वतों के रास्ते पे चल रहा हूं मैं इस नदी की धार में भी बह रहा हूं मैं। हिमशिखर की बर्फ सा पिघल रहा हूं मैं। हमसफ़र के संग में जी रहा हूं मैं इन घटाओं, वादियों को पी रहा हूं मैं। मस्त हो के मस्तियों में खो गया हूं मैं। नीरज'नील' 24-05-2018

किसने देखा है....

किसने देखा है.... (पता नहीं कि मेरे मन में ये भाव क्यों आए। मैं स्वयं स्तब्ध हूं।) किसने देखा है मौत के बाद का मंजर, जिसमें होती हैं, नम‌ आंखों से बहती आंसुओं की नदियां। किसने देखी है, उसके बाद बुझते दिये सी भभकती जिन्दगियां। किसने देखी है, उसके बाद लोगों के बीच होती सुगबुगाहट। किसने सुनीं हैं, लोगों के स्वरों से बरसती वो सांत्वना भरी ध्वनियां। किसने देखे हैं, विरह की तड़पन में बिलखते वो चंद लोग। किसी के जाने के बाद किसी का टूटता संसार, किसने देखा है। किसने महसूस किया है, कुछ रिश्तों की अहमियत का बढ़ता-घटता स्वरुप। (और भी बहुत कुछ है लेकिन किसी के अलग होने के दुःख को व्यक्त करने के लिए इतना ही काफी है।) नीरज'नील' 29-05-2018

"अब भी समय है बचा लो इसे"

आज की कविता "अब भी समय है बचा लो इसे" टूटने से लगे हैं रिश्ते बिखरने से लगे हैं घर अपना उल्लू सीधा करने के लिए आज इंसान न जाने क्या-क्या चालें चलने लगा है। न जाने किस वहमों- गुमान में रहने लगे हैं लोग न जाने क्यों अब डर सा लगता है कि कौन किस बात का बुरा मान जाए। किस बात से कौनसा रिश्ता बिगड़ न जाए। कभी - कभी तो नफरत सी होने लगती है। फिर सोचता हूं कि कम से कम मैं तो बचा हूं अभी उस गंदी दल-दल से। कम से कम अब भी मैं रिश्तों को अपने नजरिए से देख पाता हूं। ये सोचकर दिल को सुकून मिलता है कि अब भी मैं रिश्तों की गहराई को माप लेता हूं। आधुनिकता की ये दौड़ न जाने कहां ले जाएगी तूफानों में फंसी, लहरों के थपेड़े खाती इस रिश्तों की नाव को। अब भी समय है बचा लो इसे। न जाने दिलों में उठते इन तूफानों का अंजाम क्या होगा। नीरज'नील' 30-05-2018

मोबाईली दुनिया

आज की कविता (बस मोबाईली दुनिया पर पिता जी की व्यंग्योक्तियों को कविता में ढाला है। आज सुबह की ताज़ा, सत्य घटना पर आधारित।) "फोन होते तो" भाई का‌ फोन बजते ही पिता जी ने मां से कहा "काश हमारे जमाने में भी ऐसे फोन होते, तो हम भी बातें करते और तुम भी बातें करते। हम तुमको देखा करते, तुम हमको देखा करते। विडियो कोलिंग करते, व्हाट अप पर चेटिंग करते। हम भी सेल्फी लेते और तुम भी सेल्फी लेते। तुम फोटो शेयर करते, हम फोटो शेयर करते। तुम भी सज-धज कर रहते, हम भी सज-धज कर रहते। हम खूब दिखाया करते तुम खूब दिखाया करते। (सबसे अहम पंक्तियां) ग़र फोन जो ये तब होते तो प्यार ना इतना होता। तो सिर्फ दिखावा होता, तो सिर्फ दिखावा होता। ना वैसे रिश्ते होते, ना वैसे नाते होते। ना इंतजार वो होता, ना ही खुमार वो होता। ना आंखों से आंखें मिलती, ना वो प्यारी बातें होती। अच्छा है ना वो (फोन) था तब, अच्छा हो ना होता वो (फोन) अब। वो प्यार तो बच जाएगा, वो बातें बच जाएंगी, जो घंटों हुआ करती थी, कांधे पर सर रख कर तेरे, हाथों में हाथों को डाले। फोनों वाली दुनिया छोटी, छोटे होते रिश्ते-नाते। क...

तूझसे मोहब्बत की सज़ा

तूझसे मोहब्बत की सज़ा अब भी पाते हैं हम, तेरे गाये गीत अब भी गाते हैं हम। तूने तब भी नहीं समझा था मुझको, अब भी तू नासमझ बन कर तड़पाती है मुझे। गैर की बाहों में भी तुझे सूकून न मिला दिलबर, मुझको भी तड़पता छोड़ गई यूं ही। तब भी मैं तेरे चेहरे की चमक में खोया रहता था। अब भी तेरे माथे की शिकन सोने नहीं देती मुझको। तेरी गलियों से जब भी गुजरता था मैं, तेरी खुशबू से मेरा मन महक उठता था यूं ही। आज भी उस खुशबू से मेरा मन महका करता है यूं ही। तूने तब भी ना माना अपना, कहती थी डर लगता है। अब भी तू अपना कहने से डरती क्यों है। नीरज'नील' 04-06-2018

जब भी देखता हूं तुम्हें

जब भी देखता हूं तुम्हें, देखते रह जाता हूं मैं। जब भी सोचता हूं तुम्हें, सोचते रह जाता हूं मैं। तेरे लबों की मुस्कुराहट मेरी कविता बन जाती है। कभी तेरे लफ़्ज़ों से बयां होकर मेरी कहानी बन जाती है। दिन भर की कड़ी धूप में तप कर जब घर पहुंचता हूं। तेरे नर्म हाथों से मेरे बालों में में वो उंगलियां घुमाना। तेरे चेहरे पे खिलती हंसी मुझे अंदर तक भीगो जाती है। और मैं भी वैसे ही ठंडा होने लगता हूं जैसे धूप से तपती रेत पर बारिश की बूंदे गिरी हों नीरज'नील' 07-06-2018

कुछ भी पाना मुश्किल नहीं

गर तुम चाहते तो, कुछ भी पाना मुश्किल न था। तुम्हारे बेवजह जलते घरों‌ को बचाना मुश्किल न था। तुम्हारी चाहतों को जिन काली घटाओं ने घेरा। यूं सहज हाथों से उन्हें हटाना मुश्किल न था। गर ठान लेते तूफानों से लड़ना है, तो हवा का रुख मोड़ना मुश्किल न था। नीरज'नील' 17-06-2018

चुनावों का दौर

चुनावों का दौर.......... भाई चुनावों का दौर है। आजकल के शिक्षण संस्थानों की स्थिति कुछ और है। यहां पढ़ाई कम गतिविधियों के नाटकअधिक हो रहे हैं।। सभी मास्टर दुखी हैं, रो रहे हैं। बच्चे इन गतिविधियों के चक्कर में, अपना बहुत समय खो रहे हैं। कोई समझाए इन हुक्मरानों को, इन चुनावी नाटकों के फेर में, हम अपनी भावी पीढ़ी खो रहे है। इन सप्ताहों, पखवाड़ों, दिवसों को कागजों में मना-मना कर आज के तथाकथित राजनेता, सीना तानकर सो रहे हैं। कुछ तो शर्म रखो, कुछ तो हद रखो। जिन महान व्यक्तियों ने देश के लिए अपनी जान दे दी हंसते हुए। उनका भी बंटवारा कर डाला पार्टियों में। सपूतों को भी किसी तथाकथित पार्टी का मेम्बर बना डाला। खून की होली खेलने वाले सेना के जवानों को तक नहीं छोड़ा। उन्हें भी गंदी राजनीति के रंग से रंग डाला। इस माहौल में कभी कभी पढ़ाई को भी तथाकथित कहने का मन करता है। शिक्षक की नौकरी छोड़ तथाकथित राजनेता बनने का मन करता है। लेकिन फिर अचानक मुझे अपनी जिम्मेदारी का अहसास हो आता है। सोचता हूं कि अगर शिक्षक नहीं रहा तो देश की बिखरती पीढ़ी को कौन संभालेगा? कौन उसमें सही-गलत की समझ पैदा करेगा? ...

तू हमसफ़र मेरा

तू हमसफ़र मेरा, तू हमनवाज़ है। तू ही गीत मेरा, तू ही साज़ है। तू‌ है खुदा मेरा, तू ही हमराज़ है। तू ही इबादत मेरी, तू ही नवाज़ है। तू ही ज़ुबान मेरी, तू ही अल्फाज़ है। तू ही अंत मेरा, तू ही आगाज़ है। तू तस्सवुर मेरा, तू सरफराज है। नीरज'नील' 24-11-2018

याद आ रहा है मुझे वो घर

याद आ रहा है मुझे वो घर जहाँ बिता है बचपन मेरा जो बसा है मेरी रगों में जहाँ माँ मुझे लोरी सुनाया करती थी पिता खिलाते थे जहाँ जहाँ रोज खेला करता था मैं जहाँ ठोकर खाकर बहुत कुछ सिखा है मैंने गिरकर संभलना सिखा है उठकर फिर चलना सिखा है जहाँ जीवन का स्वर्ग था मेरा| आज वहां केवल दर्द है ना माँ की आवाज सुनाई ना ही पिता का वह प्यार दिखाई देता है ना भाई की आवाज साथ खड़ी होती है अकेला सा रह गया हूँ मैं लगता है बंट सा गया हूँ दुनिया के जंजाल में खो सा गया हूँ कहीं| इस अनहद में भटकता हूँ कहीं थक सा गया हूँ| कई बार सब छोड़ने का मन करता है| नीरज 'नील' 16/01/2018

क्या कर रहे हैं हम

क्या कर रहे हैं हम देखो ! क्या कर रहे हैं हम रोते हैं सारी ज़िन्दगी करते नहीं हैं कुछ और चाहते हैं बहुत कुछ पाना| बचपन नहीं है ये कि ये गलतियाँ यूँ ही भुला दी जाएँगी सुनाकर थोड़ी सी झिड़की अतीत की कब्र में सुला दी जाएँगी| ये उम्र का वो पड़ाव है जहाँ बनना है हमें आदर्श दिखना है हमें मानव की तरह| अपनी विकृत मानसिकता बदल डालो और अपने अतीत को खंगालो शायद कुछ मिल जाये ऐसा जिससे बदल जाये ज़िन्दगी| बदल जाये लोगों की धारणा| अरे ! ओ आदमी | आदमी हो, कुछ तो करो ! कुछ तो करो ! क्या कर रहे हैं हम देखो ! क्या कर रहे हैं हम| नीरज 'नील' 04/02/2019

घर क्या है.......

घर क्या है ......... आत्मा का ताप है। संस्कार है। प्यार है। जिजीविषा है। ललक है। महक है बचपन की। आँगन है खेल का। एक बड़ा आगे पीछे चलती रेल का। खेल खेल और खेल का। खिलखिलाती धूप है। ठण्ड में आराम देता अलाव है। कभी जीवन का गिरना तो कभी जीवन का उठाव है। घर क्या है- होली का रंग है। जीने का ढंग है। मौसम की मार है। कभी तपती धूप में बारिश की शीतल बौछार है। घर क्या है क्या नहीं है कहना मुश्किल है। घर ये है घर वो है। घर सब कुछ है। हाँ,सच! घर सब कुछ है। नीरज "नील" 06-02-2016

"बिन पानी सब सून"।

"बिन पानी सब सून"। पानी की कहानी भी बड़ी अजीब है। पानी है तो सब सजीव है। कहा जाता है कि जल ही जीवन है। जल है तो कल है। समय ने बार-बार चेताया, लेकिन "समझदार" मनुष्य समझ ना पाया। अब स्थिति विकट हो चली, "समझदार" मनुष्य के जीवन में मची खलबली। अब तो हुजूर पानी की लड़ाई होती है, पानी के सरकारी नलों पर कितनी महिलाएं बेचारी लड़-झगड़कर कर इज्ज़त खोती हैं। चाहे महाराष्ट्र हो या राजस्थान सब सूखा प्रभावित है। जल तो है नहीं, सब गर्मी से आप्लावित हैं। अब समय फिर से आइना दिखा रहा है, कहीं किसान की मौतें, तो कहीं पशुओं की मौतें, "बेचारा" पानी भी अपनी मजबूरी जता रहा है। संभलो, संभालो, अब भी बचा लो। "बिन पानी सब सून"। नीरज 'नील' 06-06-2019

बदलती तस्वीर.....

बदलती तस्वीर..... मेरे घर के पास एक खेत हुआ करता था जिसमें फसलें लहलहाती थी कभी गेहूं कभी बाजरा कभी चने की खेती कभी कभी तो खीरे- ककड़ी की खेती भी होती थी जनाब! कभी खेत तरबूज से लहालोट रहता था एक बात बताऊँ राज़ की मैंने भी कई बार छिपकर तरबूज चुराए हैं| उस चोरी का भी अपना मज़ा था जिसमें ना कोई गम था ना कोई सज़ा थी| अगर काका देख भी लेते तो काकी से कहते तरबूज ही तो लिया है तेरे सोने का हार थोड़े ही है कितना बड़ा दिल था उनका| लेकिन अब ................... ना खेत रहे ना काका ना ही रहा उनका दुनिया से भी बड़ा दिल| अब उन खेतों में सन्नाटा पसरता है| (अब खेतों का पानी सूख चूका है|) सूखे, बेजान और लाचार खेतों कीजमीन अब तरसती है तर होने को कभी जल सिक्त खेतों से ठण्डी हवाएं बहा करती थी| अब ... अब वहाँ केवल आग बरसती है वहाँ कभी रौनक हुआ करती थी अब तो कोरा सन्नाटा पसरता है| मैंने उन खेतों के साथ काका की सूखती आँखों को भी देखा है| कितना डर, कितनी बेचैनी थी उन आँखों में | लेकिन वो मंज़र तब भी सुकून देता था जब उन खेतों में खेल के मैदान बने| (बच्चे अक्सर वहाँ क्रिकेट खेलते थी |) अल-सुबह बच्चों के चिल्...