चुनावों का दौर

चुनावों का दौर..........
भाई चुनावों का दौर है।
आजकल के शिक्षण संस्थानों की स्थिति कुछ और है।
यहां पढ़ाई कम
गतिविधियों के नाटकअधिक हो रहे हैं।।
सभी मास्टर दुखी हैं, रो रहे हैं।
बच्चे इन गतिविधियों के चक्कर में,
अपना बहुत समय खो रहे हैं।
कोई समझाए इन हुक्मरानों को,
इन चुनावी नाटकों के फेर में,
हम अपनी भावी पीढ़ी खो रहे है।
इन सप्ताहों, पखवाड़ों, दिवसों को कागजों में मना-मना कर आज के तथाकथित राजनेता,
सीना तानकर सो रहे हैं।
कुछ तो शर्म रखो,
कुछ तो हद रखो।
जिन महान व्यक्तियों ने देश के लिए अपनी जान दे दी हंसते हुए।
उनका भी बंटवारा कर डाला
पार्टियों में।
सपूतों को भी किसी तथाकथित पार्टी का मेम्बर बना डाला।
खून की होली खेलने वाले सेना के जवानों को तक नहीं छोड़ा।
उन्हें भी गंदी राजनीति के रंग से रंग डाला।
इस माहौल में कभी कभी पढ़ाई को भी तथाकथित कहने का मन करता है।
शिक्षक की नौकरी छोड़
तथाकथित राजनेता बनने का मन
करता है।
लेकिन फिर अचानक मुझे अपनी जिम्मेदारी का अहसास हो आता है।
सोचता हूं कि अगर शिक्षक नहीं रहा तो देश की बिखरती पीढ़ी को कौन संभालेगा?
कौन उसमें सही-गलत की समझ पैदा करेगा?
कौन कराएगा उसकी सत्य से पहचान।
अरे दुश्मनों!
शिक्षा को राजनीति का मैदान मत बनाओ।
बच्चों को स्कूलों और खेल के मैदानों में रहने दो।
खेल की शक्ल लेती पल पल बदलती शिक्षा को कम से कम "शिक्षा" रहने दो।
नीरज 'नील'
02-10-2018

Comments