"अब भी समय है बचा लो इसे"

आज की कविता
"अब भी समय है बचा लो इसे"
टूटने से लगे हैं रिश्ते
बिखरने से लगे हैं घर
अपना उल्लू सीधा करने के लिए आज
इंसान न जाने क्या-क्या चालें चलने लगा है।
न जाने किस वहमों- गुमान में रहने लगे हैं लोग
न जाने क्यों अब डर सा लगता है
कि कौन किस बात का बुरा मान जाए।
किस बात से कौनसा रिश्ता बिगड़ न जाए।
कभी - कभी तो नफरत सी होने लगती है।
फिर सोचता हूं कि कम से कम
मैं तो बचा हूं अभी उस गंदी दल-दल से।
कम से कम अब भी मैं रिश्तों को
अपने नजरिए से देख पाता हूं।
ये सोचकर दिल को सुकून मिलता है
कि अब भी मैं रिश्तों की गहराई को माप लेता हूं।
आधुनिकता की ये दौड़ न जाने कहां ले जाएगी
तूफानों में फंसी, लहरों के थपेड़े खाती
इस रिश्तों की नाव को।
अब भी समय है बचा लो इसे।
न जाने दिलों में उठते इन तूफानों का अंजाम क्या होगा।
नीरज'नील'
30-05-2018

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