"पार्वती"

आज की कविता
"पार्वती"
पहाड़ों से घाटी में उतरती "पार्वती"
कल-कल करती,
लहराती, बलखाती, इठलाती पार्वती।
निश्चल, निर्मल, अटूट विश्वास,
अनमोल आस्था से जुड़ी पार्वती।
कुछ देर में ही मुझे अंदर तक भीगो गई।
कितने खुश रहते हैं किनारे पर पड़े पत्थर
भरे रहते हैं अक्षय ऊर्जा से।
पार्वती के प्रिय शिव से,
लगे रहते हैं निरंतर तपस्या में।
तेज़ तपती धूप में भी,
शीतल करती पार्वती।
कल-कल करती,
लहराती, बलखाती, इठलाती पार्वती।
नीरज'नील'
24-05-2018

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