याद आ रहा है मुझे वो घर

याद आ रहा है मुझे वो घर
जहाँ बिता है बचपन मेरा
जो बसा है मेरी रगों में
जहाँ माँ मुझे लोरी सुनाया करती थी
पिता खिलाते थे जहाँ
जहाँ रोज खेला करता था मैं
जहाँ ठोकर खाकर बहुत कुछ सिखा है मैंने
गिरकर संभलना सिखा है
उठकर फिर चलना सिखा है
जहाँ जीवन का स्वर्ग था मेरा|
आज वहां केवल दर्द है
ना माँ की आवाज सुनाई
ना ही पिता का वह प्यार दिखाई देता है
ना भाई की आवाज साथ खड़ी होती है
अकेला सा रह गया हूँ मैं
लगता है बंट सा गया हूँ
दुनिया के जंजाल में
खो सा गया हूँ कहीं|
इस अनहद में भटकता हूँ कहीं
थक सा गया हूँ|
कई बार सब छोड़ने का मन करता है|
नीरज 'नील'
16/01/2018

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