तूझसे मोहब्बत की सज़ा

तूझसे मोहब्बत की सज़ा अब भी पाते हैं हम,
तेरे गाये गीत अब भी गाते हैं हम।
तूने तब भी नहीं समझा था मुझको,
अब भी तू नासमझ बन कर तड़पाती है मुझे।
गैर की बाहों में भी तुझे सूकून न मिला दिलबर,
मुझको भी तड़पता छोड़ गई यूं ही।
तब भी मैं तेरे चेहरे की चमक में खोया रहता था।
अब भी तेरे माथे की शिकन सोने नहीं देती मुझको।
तेरी गलियों से जब भी गुजरता था मैं,
तेरी खुशबू से मेरा मन महक उठता था यूं ही।
आज भी उस खुशबू से मेरा मन महका करता है यूं ही।
तूने तब भी ना माना अपना, कहती थी डर लगता है।
अब भी तू अपना कहने से डरती क्यों है।
नीरज'नील'
04-06-2018

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