बदलती तस्वीर.....
बदलती तस्वीर.....
मेरे घर के पास एक खेत हुआ करता था
जिसमें फसलें लहलहाती थी
कभी गेहूं
कभी बाजरा
कभी चने की खेती
कभी कभी तो खीरे- ककड़ी की खेती भी
होती थी जनाब!
कभी खेत तरबूज से लहालोट रहता था
एक बात बताऊँ राज़ की
मैंने भी कई बार छिपकर तरबूज चुराए हैं|
उस चोरी का भी अपना मज़ा था
जिसमें ना कोई गम था
ना कोई सज़ा थी|
अगर काका देख भी लेते तो
काकी से कहते तरबूज ही तो लिया है
तेरे सोने का हार थोड़े ही है
कितना बड़ा दिल था उनका|
जिसमें फसलें लहलहाती थी
कभी गेहूं
कभी बाजरा
कभी चने की खेती
कभी कभी तो खीरे- ककड़ी की खेती भी
होती थी जनाब!
कभी खेत तरबूज से लहालोट रहता था
एक बात बताऊँ राज़ की
मैंने भी कई बार छिपकर तरबूज चुराए हैं|
उस चोरी का भी अपना मज़ा था
जिसमें ना कोई गम था
ना कोई सज़ा थी|
अगर काका देख भी लेते तो
काकी से कहते तरबूज ही तो लिया है
तेरे सोने का हार थोड़े ही है
कितना बड़ा दिल था उनका|
लेकिन अब ...................
ना खेत रहे
ना काका
ना ही रहा उनका दुनिया से भी बड़ा दिल|
अब उन खेतों में सन्नाटा पसरता है|
(अब खेतों का पानी सूख चूका है|)
ना खेत रहे
ना काका
ना ही रहा उनका दुनिया से भी बड़ा दिल|
अब उन खेतों में सन्नाटा पसरता है|
(अब खेतों का पानी सूख चूका है|)
सूखे, बेजान और लाचार खेतों कीजमीन
अब तरसती है तर होने को
कभी जल सिक्त खेतों से
ठण्डी हवाएं बहा करती थी|
अब ...
अब वहाँ केवल आग बरसती है
वहाँ कभी रौनक हुआ करती थी
अब तो कोरा सन्नाटा पसरता है|
मैंने उन खेतों के साथ
काका की सूखती आँखों को भी देखा है|
कितना डर, कितनी बेचैनी थी
उन आँखों में |
अब तरसती है तर होने को
कभी जल सिक्त खेतों से
ठण्डी हवाएं बहा करती थी|
अब ...
अब वहाँ केवल आग बरसती है
वहाँ कभी रौनक हुआ करती थी
अब तो कोरा सन्नाटा पसरता है|
मैंने उन खेतों के साथ
काका की सूखती आँखों को भी देखा है|
कितना डर, कितनी बेचैनी थी
उन आँखों में |
लेकिन वो मंज़र तब भी सुकून देता था
जब उन खेतों में खेल के मैदान बने|
(बच्चे अक्सर वहाँ क्रिकेट खेलते थी |)
जब उन खेतों में खेल के मैदान बने|
(बच्चे अक्सर वहाँ क्रिकेट खेलते थी |)
अल-सुबह बच्चों के चिल्लाने की आवाजें आने लगती थी|
(क्रिकेट खेलते बच्चों की जोश भरी चिल्लाहट)
(क्रिकेट खेलते बच्चों की जोश भरी चिल्लाहट)
समय के साथ
कैसे वो खेत "खेल के मैदान" में बदल गए
पता ही नहीं चला|
जब भी गर्मी की छुट्टियों में घर जाया करता था
छत पर टहलते हुए पुरानी यादें ताज़ा कर लिया करता था|
कैसे वो खेत "खेल के मैदान" में बदल गए
पता ही नहीं चला|
जब भी गर्मी की छुट्टियों में घर जाया करता था
छत पर टहलते हुए पुरानी यादें ताज़ा कर लिया करता था|
लेकिन अचानक ......
अचानक ना जाने क्या हुआ !
सब कुछ बदल सा गया
सुना वहाँ "दारू का ठेका" खुला है|
सूखे खेतों की सूखी से तस्वीर लिए
बूढ़े और जवान
मज़दूर और किसान
डूबने लगे गहरे दलदल में
दलदल ऐसा कि जिसमें से बचकर
बाहर निकलना किसी किस्मत वाले को ही नसीब है|
कोई बिरला ही बच पाता है शायद!
अचानक ना जाने क्या हुआ !
सब कुछ बदल सा गया
सुना वहाँ "दारू का ठेका" खुला है|
सूखे खेतों की सूखी से तस्वीर लिए
बूढ़े और जवान
मज़दूर और किसान
डूबने लगे गहरे दलदल में
दलदल ऐसा कि जिसमें से बचकर
बाहर निकलना किसी किस्मत वाले को ही नसीब है|
कोई बिरला ही बच पाता है शायद!
कभी खेत, कभी खेल के मैदान रही वो ज़मीन
अब नसेडियों का अड्डा बन चुकी है
अब वहाँ झुंड बनाए शराबी बैठा करते हैं
रात हो या चिलचिलाती धूप
हर पल "महफ़िल " सजा करती है
अब वहाँ रातों को उल्लू नज़र आते हैं
अरे भाई ! वो उल्लू नहीं जो आप समझ रहे हैं
नशे में धुत उल्लू !
शायद सरकार को युवा पीढ़ी के भविष्य बनाने,
उनको रोज़गार देने,
देश में सड़कें बनाने
और देशवासियों को तमाम सुविधाएँ देने हेतु
केवल इन्हीं "शराबियों" का सहारा है|
शायदइनके नशे की लत ही
देश चला रही है|
शायद ये शराबी ,नशेडी ही भारत माता को
फिर जवान बना देंगे |
शायद ये शराबी जितना नशे में डूबेंगे
उतनी ही देश तरक्की करेगा |
लेकिन सरकार भी ये जानती है
और जनता भी
कि देश गर्त में डूब रहा है|
ये नशा देश को ख़त्म कर देगा|
फिर भी जाने क्यों?
देश में ठेके पर ठेके खुल रहे हैं|
युवा पीढ़ी की आँखे
नशे में धुत हो बंद रही हैं |
सम्भालो देश की जवान होती पीढ़ी को
सफलता के चरम तक पहुँचने की सीढी को|
पहचानो कि कौनसी तस्वीर चाहते हो
लहलहाते खेतों में काम करते वो किसान
खेल के मैदान ही सही
या भारत की वो युवा पीढ़ी
जो नशे में धुत पड़ी है
कोशिश करके देखो तो सही,
शायद भारत की तस्वीर सच में बदल जाए|
अब नसेडियों का अड्डा बन चुकी है
अब वहाँ झुंड बनाए शराबी बैठा करते हैं
रात हो या चिलचिलाती धूप
हर पल "महफ़िल " सजा करती है
अब वहाँ रातों को उल्लू नज़र आते हैं
अरे भाई ! वो उल्लू नहीं जो आप समझ रहे हैं
नशे में धुत उल्लू !
शायद सरकार को युवा पीढ़ी के भविष्य बनाने,
उनको रोज़गार देने,
देश में सड़कें बनाने
और देशवासियों को तमाम सुविधाएँ देने हेतु
केवल इन्हीं "शराबियों" का सहारा है|
शायदइनके नशे की लत ही
देश चला रही है|
शायद ये शराबी ,नशेडी ही भारत माता को
फिर जवान बना देंगे |
शायद ये शराबी जितना नशे में डूबेंगे
उतनी ही देश तरक्की करेगा |
लेकिन सरकार भी ये जानती है
और जनता भी
कि देश गर्त में डूब रहा है|
ये नशा देश को ख़त्म कर देगा|
फिर भी जाने क्यों?
देश में ठेके पर ठेके खुल रहे हैं|
युवा पीढ़ी की आँखे
नशे में धुत हो बंद रही हैं |
सम्भालो देश की जवान होती पीढ़ी को
सफलता के चरम तक पहुँचने की सीढी को|
पहचानो कि कौनसी तस्वीर चाहते हो
लहलहाते खेतों में काम करते वो किसान
खेल के मैदान ही सही
या भारत की वो युवा पीढ़ी
जो नशे में धुत पड़ी है
कोशिश करके देखो तो सही,
शायद भारत की तस्वीर सच में बदल जाए|
नीरज "नील"
11-05-2019
11-05-2019
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