जब भी देखता हूं तुम्हें
जब भी देखता हूं तुम्हें, देखते रह जाता हूं मैं।
जब भी सोचता हूं तुम्हें, सोचते रह जाता हूं मैं।
तेरे लबों की मुस्कुराहट मेरी कविता बन जाती है।
कभी तेरे लफ़्ज़ों से बयां होकर मेरी कहानी बन जाती है।
दिन भर की कड़ी धूप में तप कर जब घर पहुंचता हूं।
तेरे नर्म हाथों से मेरे बालों में में वो उंगलियां घुमाना।
तेरे चेहरे पे खिलती हंसी मुझे अंदर तक भीगो जाती है।
और मैं भी वैसे ही ठंडा होने लगता हूं जैसे धूप से तपती रेत पर बारिश की बूंदे गिरी हों
जब भी सोचता हूं तुम्हें, सोचते रह जाता हूं मैं।
तेरे लबों की मुस्कुराहट मेरी कविता बन जाती है।
कभी तेरे लफ़्ज़ों से बयां होकर मेरी कहानी बन जाती है।
दिन भर की कड़ी धूप में तप कर जब घर पहुंचता हूं।
तेरे नर्म हाथों से मेरे बालों में में वो उंगलियां घुमाना।
तेरे चेहरे पे खिलती हंसी मुझे अंदर तक भीगो जाती है।
और मैं भी वैसे ही ठंडा होने लगता हूं जैसे धूप से तपती रेत पर बारिश की बूंदे गिरी हों
नीरज'नील'
07-06-2018
07-06-2018
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