"मनाली"
आज की कविता
"मनाली"
कुल्लू से मनाली तक
क्या बताऊं यारों
सब बहुत भा गया।
वहां बिताए हर पल का कितना हिसाब दूं।
हर पल में मुझे तो बेहिसाब मज़ा आ गया।
खूबसूरत है हर नजारा यहां,
वादियां लाजवाब हैं।
पहाडों से पिघलती बर्फ,
व्यास का कल-कल बहता पानी।।
तन में ताज़गी और मन में तरंग जगा गया।
क्या बताऊं यारों,
"मनाली" में मुझे तो बेहिसाब मज़ा आ गया।
देखी मैंने मेहनत और लगन से चलती जिन्दगी यहां।
मिठी-मिठी बोली और उतने ही मिटे लोग है यहां।
चीड़ के घने-लम्बे वृक्षों के बीच पलती,
बर्फ की मोटी चादर के संग खेलती,
अपने छोटे-छोटे पांवों में मंथर गति से चलती,
बहुत-बहुत, बहुत ही सुन्दर चाल चलती जिन्दगी है यहां।
प्रकृति की गोद में पलता ये "मनाली" शहर मुझे बहुत भा गया।
क्या बताऊं यारों,
"मनाली" में बीते हर पल में मुझे तो बेहिसाब मज़ा आ गया।
क्या बताऊं यारों
सब बहुत भा गया।
वहां बिताए हर पल का कितना हिसाब दूं।
हर पल में मुझे तो बेहिसाब मज़ा आ गया।
खूबसूरत है हर नजारा यहां,
वादियां लाजवाब हैं।
पहाडों से पिघलती बर्फ,
व्यास का कल-कल बहता पानी।।
तन में ताज़गी और मन में तरंग जगा गया।
क्या बताऊं यारों,
"मनाली" में मुझे तो बेहिसाब मज़ा आ गया।
देखी मैंने मेहनत और लगन से चलती जिन्दगी यहां।
मिठी-मिठी बोली और उतने ही मिटे लोग है यहां।
चीड़ के घने-लम्बे वृक्षों के बीच पलती,
बर्फ की मोटी चादर के संग खेलती,
अपने छोटे-छोटे पांवों में मंथर गति से चलती,
बहुत-बहुत, बहुत ही सुन्दर चाल चलती जिन्दगी है यहां।
प्रकृति की गोद में पलता ये "मनाली" शहर मुझे बहुत भा गया।
क्या बताऊं यारों,
"मनाली" में बीते हर पल में मुझे तो बेहिसाब मज़ा आ गया।
नीरज'नील'
21-05-2018
21-05-2018
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