Posts

"तुम मेरे खुदा नहीं तो क्या हो"

"तुम मेरे खुदा नहीं तो क्या हो" कैसे कहूं कि तुम मेरे क्या हो, हर रंग हो, खुशी हो, जिंदगी हो, तुम ही कहो,  तुम मेरे खुदा नहीं तो क्या हो। मेरी हर धड़कन में तुम हो, हर सांस में, सीरत में, फितरत में, हर ख़्वाब में,तुम ही तो हो। तुम ही कहो, तुम मेरे खुदा नहीं तो क्या हो। जिंदगी तुमसे, दिल्लगी तुमसे, जिसनगी तुमसे, हर दुआ में तुम ही शामिल। तुम ही कहो, तुम मेरे खुदा नहीं तो क्या हो। नीरज'नील' 12-05-2018

" याद है मुझे "

श्रृंगार रस में एक छोटा सा प्रयास है। आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं। " याद है मुझे " रोज तेरी यादों का तकिया लगा कर सोता हूं मैं, कभी-कभी तेरी यादों के साये में ढलती है रातें मेरी, तेरा स्पर्श सर्दी की नर्म धूप का एहसास कराता है कभी, तेरे चेहरे की चमक देखकर खिल उठता है मन मेरा। तेरी उंगलियों में उंगलियां फंसाकर वो घंटों बैठना याद आता है मुझे। तेरी गर्म सांसों का एहसास अब भी हुआ करता है मुझे। तेरी नर्म उंगलियों का पीठ पर धीरे-धीरे छूआना याद है मुझे। तेरा हर लफ्ज़ एक कहानी सा लगता है मुझे। तेरी मीठी बोली का कानों में अमृत घोलना याद है मुझे। मेरे कांधे पे सर रख कर तेरा समर्पण याद है मुझे। तेरी हर बात, हां हर एक बात याद है मुझे। नीरज'नील' 11-05-2018

"रिश्तों की कहानी, कविता की जूबानी"

"रिश्तों की कहानी, कविता की जुबानी" कुछ रिश्ते कितने बेपरवाह से होते हैं। कुछ रिश्ते कितने लापरवाह से होते हैं। कुछ रिश्ते प्यार से सराबोर हैं। कुछ में एक अजीब सी कशिश हैं। कहीं एक बेखौफ़ सी समझदारी हैं। कहीं रिश्ते घसीटने की लाचारी हैं। कुछ रिश्ते होली की रंग बिरंगी गुलाल हैं। तो कुछ में ना हड्डी न खाल है। कुछ रिश्ते बस अवशेष बनकर रह गए हैं। कुछ मातम के बाद के सन्नाटे से शेष रह गए हैं। कुछ रिश्ते किचड़ में खिले कमल से हैं। तो कुछ कांटों भरे गुलाब से हैं। कहीं चूड़ियों की खनक से हैं रिश्ते। कहीं चाहतों की सनक से हैं रिश्ते। कहीं पूनम की सर्द रात से हैं ये रिश्ते। कहीं जेठ की तपती धूप से ये रिश्ते। कभी नर्म दूब से कोमल ये रिश्ते। कभी नुकिली शूल हो जाएं ये रिश्ते। कभी नर्म तकिये से हो जाएं ये रिश्ते, कभी सख्त, पत्थर से हो जाएं ये रिश्ते। सच है, पर कितनी अजीब है, ये रिश्तों की कहानी, कविता की जुबानी। नीरज'नील' 17-05-2018

"माइके में आई हुई बेटी "

"माइके में आई हुई बेटी " माइके में आई हुई बेटी जब ससुराल जाने को होती है। जब समेटती हैं अपना समान उसको मन भारी सा हो जाता है। बार बार घर के कोनो में अपना सामान तलाशती  वो सामान नहीं बल्कि वहाँ बितायी अपनी यादें समेटती है। तय करती है वो अपने बचपन से लेकर पिता के घर से विदा होने तक का सफ़र । वो छोड़ना नहीं चाहती है उस घर को विदाई के अंतिम क्षण तक फिर एक बार। उसे याद हो आता है विवाह के बाद की विदाई का समय। वो फिर लौट आना चाहती है फिर उसी बचपन में जब माँ की ऊँगली थाम वो घुमा करती थी गलियों में। गली में कुल्फी वाले की आवाज मन को बेचैन कर देती थी। जब माँ से वो कुल्फी के लिए जिद किया करती थी। पिता के कंधे पर बैठकर वो बाजार घूमना भी तो याद हो जाता है पल भर के लिए। आँखों में अब तक का सारा बचपन लड़कपन जवानी सब फिर से घूम जाती है। फिर रोना आता जाता है विदाई का वो दृश्य एक बार फिर वो ही कहानी दोहराता है। मन भारी है, फिर भी वो चल देती है पिया संग। केवल उसकी ख़ुशी के लिए। जाती है संग पिया के, फिर माइके लौट आने की आशा में। पिता के आँगन की सुगंध लिए एक बार फिर विदा होती है। नीरज 'नी...

"मनाली"

आज की कविता "मनाली" कुल्लू से मनाली तक क्या बताऊं यारों सब बहुत भा गया। वहां बिताए हर पल का कितना हिसाब दूं। हर पल में मुझे तो बेहिसाब मज़ा आ गया। खूबसूरत है हर नजारा यहां, वादियां लाजवाब हैं। पहाडों से पिघलती बर्फ, व्यास का कल-कल बहता पानी।। तन में ताज़गी और मन में तरंग जगा गया। क्या बताऊं यारों, "मनाली" में मुझे तो बेहिसाब मज़ा आ गया। देखी मैंने मेहनत और लगन से चलती जिन्दगी यहां। मिठी-मिठी बोली और उतने ही मिटे लोग है यहां। चीड़ के घने-लम्बे वृक्षों के बीच पलती, बर्फ की मोटी चादर के संग खेलती, अपने छोटे-छोटे पांवों में मंथर गति से चलती, बहुत-बहुत, बहुत ही सुन्दर चाल चलती जिन्दगी है यहां। प्रकृति की गोद में पलता ये "मनाली" शहर मुझे बहुत भा गया। क्या बताऊं यारों, "मनाली" में बीते हर पल में मुझे तो बेहिसाब मज़ा आ गया। नीरज'नील' 21-05-2018

"कितने सुंदर लगते हैं"

गीत ("पार्वती" नदी के तट पर बैठे-बैठे जन्मा ये गीत परमपिता परमेश्वर को समर्पित है जिन्होंने मुझे यह सब अनुभव करने का सौभाग्य प्रदान किया।) नीरज'नील' "कितने सुंदर लगते हैं" कल-कल बहती है ये नदियां कितनी सुंदर लगती हैं।। प्यारे- प्यारे हैं ये नजारे कितने सुंदर लगते हैं।। देवदार और चीड़ यहां पर कितने सुंदर लगते हैं।। ऊंचे-ऊंचे हैं पहाड़ ये कितने सुंदर लगते हैं।। ढ़के बर्फ से है पहाड़ ये कितने सुंदर लगते हैं।। मनमोहक है ये हरियाली कितनी सुंदर लगती है।। नदियों के ये घाट- किनारे कितने सुंदर लगते हैं।। जलधारा से हुए ये चिकने पत्थर सुंदर लगते हैं। नीरज'नील' 24-05-2018

"पार्वती"

आज की कविता "पार्वती" पहाड़ों से घाटी में उतरती "पार्वती" कल-कल करती, लहराती, बलखाती, इठलाती पार्वती। निश्चल, निर्मल, अटूट विश्वास, अनमोल आस्था से जुड़ी पार्वती। कुछ देर में ही मुझे अंदर तक भीगो गई। कितने खुश रहते हैं किनारे पर पड़े पत्थर भरे रहते हैं अक्षय ऊर्जा से। पार्वती के प्रिय शिव से, लगे रहते हैं निरंतर तपस्या में। तेज़ तपती धूप में भी, शीतल करती पार्वती। कल-कल करती, लहराती, बलखाती, इठलाती पार्वती। नीरज'नील' 24-05-2018